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Monday, December 1, 2025

रामचरितमानस, पंचतंत्र और सहृदयलोक-लोकन बनी विश्व धरोहर, UNESCO ने दी मान्यता

भारतीय साहित्य और संस्कृति की पहचान श्री रामचरितमानस, पंचतंत्र और सहृदयलोक-लोचन को यूनेस्को के मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-पैसिफिक रीजनल रजिस्टर में सम्मिलित किया गया है। जो देश के लिए एक गौरव का पल है, क्योंकि भारत की इन गौरवशाली रचनाओं का यह समावेश यह साबित करता है कि भारत की समृद्ध साहित्यिक विरासत और सांस्कृतिक विरासत कितनी विस्तृत है।

मंगोलिया की राजधानी उलानबटार (Ulaanbaatar) में मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड कमेटी फॉर एशिया एंड द पैसिफिक (MOWCAP) की 10वीं बैठक का आयोजन हुआ। जिसमें इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) ने इस उपलब्धि को हासिल करने में अहम भूमिका निभाई। इस बैठक में सदस्य देशों के 38 प्रतिनिधि, 40 पर्यवेक्षकों और नामांकित व्यक्ति इक्ट्ठा हुए थे। जिनमें IGNCA ने तीन भारतीय नामांकनों का समर्थन करते हुए ‘यूनेस्को की मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-पैसिफिक रीजनल रजिस्टर’ में रामचरितमानस, पंचतंत्र और सहृदयलोक-लोचन का स्थान सुरक्षित किया।

ज्ञात हो कि, मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री के आदर्श जीवन चरित्र पर आधारित, गोस्वामी तुलसीदास जी कृत श्री ‘रामचरितमानस’, उन्नत और मूल्यवान समाज के निर्माण के लिए नीति शिक्षा का ज्ञान देने के लिए महान संस्कृत विद्वान  पंडित विष्णुशर्मा द्वारा रचित ‘पंचतंत्र’ और सहृदयलोक-लोकन, (जो संस्कृत में आचार्य आनंदवर्धन द्वारा 9वीं शताब्दी ईसा पूर्व लिखा गया एक काव्यशास्त्र है.  यह काव्य, नाट्यशास्त्र, और नाट्य अंतर्दृष्टि से जुड़े पाठों और चर्चाओं का संग्रह है. इसे संस्कृत साहित्य आलोचना की अहम रचनाओं में गिना जाता है. सहृदयलोक-लोकन ग्रंथ में सहृदय की अवधारणा पर चर्चा की गई है.)

इस तरह की कालजयी रचनाएं हैं जिन्होंने भारतीय साहित्य और संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया है, इतना ही नहीं इन रचनाओं ने देश की नैतिकता और कलात्मकता को आकार भी दिया है।

इन साहित्यिक कृतियों ने अपने पाठकों के ह्दय में एक अमिट छाप छोड़ी है। इन रचनाओं ‘सहृदयालोक-लोचन’, ‘पंचतंत्र’ और ‘रामचरितमानस’ के रचनाकार पं. आचार्य आनंदवर्धन, विष्णु शर्मा और गोस्वामी तुलसीदास थे।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में कला निधि विभाग के डीन और विभाग प्रमुख प्रोफेसर रमेश चंद्र गौड़ ने भारत की तरफ से इन तीन प्रविष्टियों ‘राम चरित मानस’, ‘पंचतंत्र’ और ‘सहृदयालोक-लोचन’ को इतना प्रभावी तरीके से प्रस्तुत किया कि यह ऐतिहासिक उपलब्धि को प्राप्त करने में सफलता मिली।

 

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