आदित्य-एल1: भारत का सोलर मिशन, पूरी दुनिया के लिए इतना खास क्यों है?

आदित्य-एल1 (ADITYA – L1): कई विकसित देशों के सूर्य पर नजर रखने के लिए अन्य सौर मिशन भी हैं, लेकिन जब बात कोरोना पर नजर रखने की आती है तो भारत के बहु चर्चित सोलर मिशन आदित्य-एल1 (ADITYA – L1) अन्य मिशनों से आगे है.

सौर विज्ञान में जानकारी रखने वाले विशेषज्ञों के अनुसार भारत के आदित्य-एल1 के कोरोनाग्राफ सूर्य के प्रकाशमंडल को पूरी तरह से ढक लेता है और साल के 365 दिन कोरोना के लगभग पूरे भाग को बिना किसी बाधा के देख सकता है.

“अंतरिक्ष में भारत के पहले सोलर मिशन, आदित्य-एल1 के लिए 2026 के एक अभूतपूर्व साल होने की उम्मीद है.”

आसान शब्दों में कहें तो, कोरोनाग्राफ एक कृत्रिम चंद्रमा की तरह काम करता है, जो सूर्य की चमकदार सतह को अवरुद्ध कर देता है, जिससे वैज्ञानिक लगातार इसके धुंधले बाहरी कोरोना का निरीक्षण कर सकते हैं.

आदित्य-एल1 (ADITYA- L1) दुनिया का एकमात्र ऐसा मिशन है जो दिखने वाली रोशनी में विस्फोटों का अध्ययन कर सकता है, जिससे सीएमई के तापमान और ऊष्मा ऊर्जा को मापा जा सकता है. एवं जो यह भी बताते हैं कि अगर सीएमई पृथ्वी की ओर बढ़े तो वह कितने शक्तिशाली होंगे.

अमेरिका की स्पेस एजेंसी नासा के अनुसार लगभग हर 11 वर्ष में एक बार सूर्य के चुंबकीय ध्रुवों के बदल जाने का घटनाक्रम होता है. और यह कुछ ऐसा ही है जैसे पृथ्वी में उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव अपनी स्थिति आपस में बदल लें.

चुंबकीय ध्रुवों के बदल जाने का घटनाक्रम बहुत उथल-पुथल वाला होता है. इस दौरान सूर्य तूफानी अवस्था में चला जाता है. सौर तूफानों और कोरोनल मास इजेक्शन (सीएमई) की संख्या में भी भारी वृद्धि होती है. इस दौरान सूर्य की सबसे बाहरी परत से आग के विशाल बुलबुले निकलते हैं. इस परत को कोरोना कहते हैं.

आवेशित कणों या चार्ज्ड पार्टिकल्स से बनने वाले कोरोनल मास इजेक्शन्स (सीएमई) एक ट्रिलियन किलोग्राम तक भारी हो सकते हैं. इनकी गति तीन हज़ार किमी प्रति सेकंड तक पहुंच सकती है.

स्टडी के अनुसार सीएमई अपना रुख पृथ्वी समेत किसी भी दिशा में कर सकते हैं.

अधिकतम रफ्तार पर, एक सीएमई को पृथ्वी और सूर्य के बीच 15 करोड़ किलोमीटर की दूरी तय करने में 15 घंटे लगेंगे.

इन सब कारणों से अंतरिक्ष में भारत के पहले सोलर मिशन, आदित्य-एल1 के लिए 2026 के एक अभूतपूर्व साल होने की उम्मीद है.

पिछले साल कक्षा में स्थापित की गई यह वेधशाला अगले साल पहली बार सूर्य को करीब से देख सकेगी.

PSLV-XL (C57) Aditya-L1 ISRO - पीएसएलवी-सी57 द्वारा लॉन्च किया गया आदित्य-एल1, सौर वातावरण का अध्ययन करने के लिए एक कोरोनोग्राफी अंतरिक्ष यान है, जिसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और विभिन्न अन्य भारतीय अनुसंधान संस्थानों द्वारा डिजाइन और विकसित किया गया है।
PSLV-XL (C57) Aditya-L1 ISRO – पीएसएलवी-सी57 द्वारा लॉन्च किया गया आदित्य-एल1, सौर वातावरण का अध्ययन करने के लिए एक कोरोनोग्राफी अंतरिक्ष यान है, जिसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और विभिन्न अन्य भारतीय अनुसंधान संस्थानों द्वारा डिजाइन और विकसित किया गया है।

आदित्य-एल1 के महत्वपूर्ण उद्देश्य

बीबीसी में पब्लिश खबर के अनुसार इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स (आईआईए) के प्रोफेसर आर रमेश कहते हैं, सामान्य या कम सक्रियता वाले समय में, सूर्य रोज दो से तीन सीएमई छोड़ता है. हमें उम्मीद है कि अगले साल ये संख्या प्रतिदिन 10 या उससे ज्यादा होगी.

प्रोफेसर रमेश विजिबल एमिशन लाइन कोरोनाग्राफ या वेल्क के प्रमुख अन्वेषक हैं. वेल्क आदित्य-एल1 पर लगे सात वैज्ञानिक उपकरणों में सबसे महत्वपूर्ण है.

प्रोफेसर रमेश इससे जुटाए गए आंकड़ों पर बारीकी से नजर रखते हैं और उनका विश्लेषण करते हैं. वह कहते हैं कि सीएमई का अध्ययन भारत के पहले सौर मिशन के सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उद्देश्यों में से एक है.

उनका कहना है कि ये उत्सर्जन सूर्य के बारे में जानने का अहम अवसर है. साथ ही सूर्य पर होने वाली गतिविधियां, पृथ्वी और अंतरिक्ष में बुनियादी ढांचे के लिए खतरा पैदा कर सकती हैं. इसलिए इन्हें समझना जरूरी है.

सीएमई शायद ही कभी मानव जीवन के लिए सीधा खतरा पैदा करते हैं, लेकिन वे भू-चुंबकीय तूफान पृथ्वी पर जीवन को प्रभावित करते हैं.

सीएमई का असर पृथ्वी के आस-पास अंतरिक्ष में मौसम पर पड़ता है, जहां भारत के 136 सहित लगभग 11,000 उपग्रह स्थित हैं.

प्रोफेसर रमेश बताते हैं, सीएमई का सबसे सुंदर उदाहरण ऑरोरा हैं, जो दिखाते हैं कि कैसे सूर्य से आवेशित कण पृथ्वी की ओर आ रहे हैं.  लेकिन ऑरोरा अंतरिक्ष में मौजूद उपग्रहों के सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को खराब कर सकते हैं, विद्युत ग्रिड को ठप कर सकते हैं. साथ ही ये मौसम और संचार उपग्रहों को भी प्रभावित कर सकते हैं.

शक्तिशाली सौर तूफान का ख़तरा

अब तक का सबसे शक्तिशाली सौर तूफान 1859 में कैरिंगटन घटना के रूप में दर्ज किया गया था, जिसने दुनिया भर में टेलीग्राफ लाइनों को ठप कर दिया था.

इसके अलावा हालिया घटना 1989 में दर्ज की गई, जब क्यूबेक के पावर ग्रिड का एक हिस्सा ठप हो गया था. इससे 60 लाख लोगों को नौ घंटे तक बिना बिजली के रहना पड़ा था.

नवंबर 2015 में, सौर गतिविधि ने हवाई यातायात नियंत्रण को बाधित किया था. इससे स्वीडन और कुछ अन्य यूरोपीय हवाई अड्डों पर अफरा-तफरी मच गई थी. फरवरी 2022 में नासा ने कहा था कि सीएमई के कारण 38 कॉमर्शियल सैटेलाइट नष्ट हो गए.

ऐसी घटनाओं से बचा जा सकता है. ये तभी संभव है जब-

  • हम सूर्य के कोरोना में होने वाली घटनाओं को सीधे देख सकें
  • सौर तूफान या कोरोनल मास इजेक्शन का अध्ययन कर सकें
  • उसकी शुरुआत में तापमान रिकॉर्ड कर सकें और उसका रास्ता ट्रैक कर सकें

अगर ये सब मुमकिन हुआ तो ऐसी घटनाओं की पहले से चेतावनी देने में मदद मिलेगी. और ऐसा चेतावनी मिले तो पावर ग्रिड और उपग्रहों को समय रहते बंद कर उन्हें सुरक्षित किया जा सके.

इसरो की नासा के साथ साझेदारी

अगले वर्ष की चरम सौर गतिविधि की तैयारी के लिए, आदित्य-एल1 के अब तक दर्ज किए गए सबसे बड़े सीएमई में से एक से जुटाए गए आंकड़ों के अध्ययन के लिए आईआईए ने नासा के साथ साझेदारी की.

अगले साल की तैयारी के मद्देनजर आदित्य-एल1 ने 13 सितंबर 2024 को 00:30 जीएमटी पर जो सौर गतिविधि दर्ज की थी उसका अध्ययन किया जा रहा है.

उस सीएमई का भार 27 करोड़ टन था. इसे यूँ समझिए कि टाइटैनिक जहाज को डुबोने वाला हिमखंड 15 लाख टन का था.

उत्पत्ति के समय इसका तापमान 1.8 मिलियन डिग्री सेल्सियस था और ऊर्जा की मात्रा 2.2 मिलियन मेगाटन टीएनटी के बराबर थी.

इसे इस तरह समझ सकते हैं कि अमेरिका द्वारा जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराए गए परमाणु बम 15 किलोटन और 21 किलोटन के थे.

प्रोफेसर रमेश बताते हैं कि पृथ्वी पर डायनासोरों को नष्ट करने वाले क्षुद्रग्रह का वजन 100 मिलियन मेगाटन था और सूर्य के अधिकतम गतिविधि चक्र के दौरान हम इससे भी ज्यादा ऊर्जा की मात्रा वाले सीएमई देख सकते हैं.

प्रोफेसर रमेश कहते हैं, हमने जिस सीएमई का मूल्यांकन किया था, वह उस समय प्रक्षेपित हुआ था जब सूर्य सामान्य सक्रियता चरण में था. अब हम ये मूल्यांकन करेंगे कि अधिकतम सक्रियता चक्र के घटित होने पर क्या कुछ होगा.

उन्होंने कहा, इससे हमें निकट अंतरिक्ष में उपग्रहों की सुरक्षा के लिए अपनाए जाने वाले बचाव के उपायों को तैयार करने में मदद मिलेगी. तथा हमें पृथ्वी के आस-पास के अंतरिक्ष की बेहतर समझ हासिल करने में भी मदद मिलेगी.

 

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