कवि प्रदीप: ‘ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा आंख में भर लो पानी’ गीत जब पहली बार स्वर-कोकिला, सुर-साम्राज्ञी, भारत रत्न लता मंगेशकर द्वारा गाया गया, तब स्वर की मिठास से ज्यादा कवि प्रदीप द्वारा गीत में पिरोए गए शब्दों ने जादू कर दिया था। इस गाना को सुनने के बाद हर भारतीय के आँखों में जाँबाज बहादुर सैनिकों के बलिदान के लिए सम्मान, उनके परिवारों के प्रति दुख के आँसू छलक उठे तथा भारत की तत्कालीन सरकार के प्रधानमंत्री की गैर प्रतिस्पर्धी, अदूरदर्शी और अविकसित सोच एवं नेत्रत्व के प्रति रोष व्याप्त हो गया था।

साठ के दशक में चीनी आक्रमण के बाद मुंबई में सैनिकों के लिए सहायता राशि जुटाने के उद्देश्य से एक कार्यक्रम आयोजित किया था। इसके लिए कवि प्रदीप को एक देशभक्ति का गीत लिखने के लिए कहा गया क्योंकि उस समय तक कवि प्रदीप वीर रस की कविताओं और देशभक्ति पर गीत लिखने के लिए काफ़ी प्रसिद्ध थे।
गीत लिखने को लेकर परेशान प्रदीप, मुंबई के माहिम में एक शाम घूम रहे थे कि तभी उनके मन में एक गीत के बोल आए और मन ही मन उन बोल को उन्होंने दुहराया जो उन्हें बहुत ही अच्छे लगे, फिर इन बोल को भूल न जाएं, इसलिए पास की पान की दुकान से सिगरेट का पैकेट ख़रीदा और उस पर उन बोलों की लाइनों को लिख लिया, इस तरह इस ‘ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा आंख में भर लो पानी’ प्रसिद्ध गीत की रचना हुई थी।
राष्ट्रकवि प्रदीप का जीवन
देश प्रेम से ओत-प्रोत भावनाओं को सुन्दर शब्दों में पिरोकर जन-जन तक पहुँचाने वाले महान राष्ट्रकवि प्रदीप का जन्म 6 फ़रवरी, 1915 में मध्य प्रदेश राज्य में उज्जैन के समीप बड़नगर नामक क़स्बे में हुआ था। प्रदीप जी का असल नाम रामचंद्र नारायण द्विवेदी था। उनका विवाह मुम्बई निवासी गुजराती ब्राह्मण चुन्नीलाल भट्ट की पुत्री सुभद्रा बेन से 1942 में हुआ था। विवाह से पूर्व जब कवि प्रदीप ने अपनी भावी पत्नी से एक प्रश्न पूछा, “मैं आग हूँ, क्या तुम मेरे साथ रह सकोगी?” तब इसका बड़ा ही सुंदर और सटीक उत्तर सुभद्रा बेन ने दिया “जी हाँ, मैं पानी बनकर रहूँगी।” इसका निर्वाह उन्होंने जीवन भर किया।

कवि प्रदीप की शुरुआती शिक्षा इंदौर में हुई, इसके बाद की शिक्षा प्रयागराज में संपन्न हुई। वर्ष 1933 से 1935 तक का इलाहाबाद का काल प्रदीप जी के लिए साहित्यिक दृष्टीकोंण से बहुत अच्छा रहा। वर्ष 1939 में लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की एवं अध्यापक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया और शिक्षक बनने का प्रयास किया, लेकिन इसी दौरान उन्हें मुंबई में हो रहे एक कवि सम्मेलन में हिस्सा लेने का न्योता मिला। कवि सम्मेलन में उनके गीतों को सुनकर ‘बाम्बे टॉकीज स्टूडियो’ के मालिक हिंमाशु राय काफ़ी प्रभावित हुए और उन्होंने प्रदीप को अपने बैनर तले बन रही फ़िल्म ‘कंगन’ के गीत लिखने की पेशकश की। इस फ़िल्म में अशोक कुमार एवं देविका रानी ने प्रमुख भूमिकाएँ निभाई थीं।
कवि का गायक बनने का सफर
पांच दशक के अपने पेशे में कवि प्रदीप ने 71 फिल्मों के लिए 1700 गीत लिखे. उनके देशभक्ति गीतों में, फिल्म बंधन (1940) में “चल चल रे नौजवान”, फिल्म जागृति (1954) में “आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं”, “दे दी हमें आजादी बिना खडग ढाल” और फिल्म जय संतोषी मां (1975) में “यहां वहां जहां तहां मत पूछो कहां-कहां” है। इस गीत को उन्होंने फिल्म के लिए स्वयं गाया भी था।
कवि प्रदीप की पहचान 1940 में रिलीज हुई फिल्म बंधन से बनी। हालांकि फ़िल्मी दुनिया में कवि प्रदीप की पहचान फ़िल्म “बंधन” तथा ‘कंगन’ में उनके गीतों की कामयाबी के बाद बतौर गीतकार हो गई। ‘कंगन’ फ़िल्म के लिए लिखे गए चार गीतों में से प्रदीप ने तीन गीतों को पहली बार अपना स्वर भी दिया था।
वर्ष 1943 की स्वर्ण जयंती हिट फिल्म ‘किस्मत’ के गीत “दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है” ने उन्हें देशभक्ति गीत के रचनाकारों में विशेष स्थान प्रदान कर दिया। इस गीत के अर्थ से क्रोधित हो कर तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उनकी गिरफ्तारी के आदेश दिए। इससे बचने के लिए कवि प्रदीप को भूमिगत होना पड़ा.
मुंबई की ‘बॉम्बे टॉकीज’ की पांच फ़िल्मों- ‘अंजान’, ‘किस्मत’, ‘झूला’, ‘नया संसार’ और ‘पुनर्मिलन’ के लिये भी कवि प्रदीप ने गीत लिखे।
महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का आशीर्वाद
प्रयागराज के साहित्यिक वातावरण में कवि प्रदीप की अंतश्चेतना में दबे काव्यांकुरों को फूटने का पर्याप्त अवसर मिला। यहाँ उन्हें हिन्दी के अनेक साहित्य शिल्पियों का स्नेहिल सान्निध्य मिला। वे कवि सम्मेलनों , गोष्ठियों में कविता का पाठ करने लगे।
प्रयागराज में एक बार हिन्दी दैनिक ‘अर्जुन’ के संपादक और स्वामी श्रद्धानंद के सुपुत्र पं. विद्यावाचस्पति के सम्मान में एक कवि-गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी की अध्यक्षता राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन कर रहे थे। महादेवी वर्मा, भगवती चरण वर्मा, प्रफुल्ल चंद्र ओझा ‘मुक्त’, हरिवंशराय बच्चन, नरेंद्र शर्मा, बालकृष्ण राव, रमाशंकर शुक्ल ‘रसाल’, पद्मकांत मालवीय जैसे दिग्गज रचनाकारों ने अपने काव्य पाठ से गोष्ठी को आलोकित किया। इसी गोष्ठी में 20 वर्षीय तरुण ‘प्रदीप’ ने अपने सुरीले काव्य-पाठ से सभी को मुग्ध कर दिया। उस दिन काव्य जगत् में एक नया सितारा चमका।
महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी ने लखनऊ की पत्रिका ‘माधुरी’ के फ़रवरी, 1938 के अंक में प्रदीप पर लेख लिखकर उनकी काव्य-प्रतिभा पर स्वर्ण-मुहर लगा दी। निराला जी ने लिखा- “आज जितने कवियों का प्रकाश हिन्दी जगत् में फैला हुआ है, उनमें ‘प्रदीप’ का अत्यंत उज्ज्वल और स्निग्ध है। हिन्दी के हृदय से प्रदीप की दीपक रागिनी कोयल और पपीहे के स्वर को भी परास्त कर चुकी है।
कवि सम्मेलनों में सूर्यकांत त्रिपाठी निरालाजी जैसे महाकवि और महान् साहित्यकार को प्रभावित कर सकने की क्षमता रामचंद्र द्विवेदी में थी। उन्हीं के आशीर्वाद से रामचंद्र ‘प्रदीप’ कहलाने लगे।
रामचंद्र नारायण द्विवेदी से कवि प्रदीप
एक प्रसंग में भी ‘बाम्बे टॉकीज स्टूडियो’ के मालिक हिमांशु राय ने कहा कि ये रेलगाड़ी जैसा लम्बा नाम ठीक नही है, तब उन्होंने अपना नाम प्रदीप रख लिया।
प्रदीप नाम के पीछे उनके जीवन का एक रोचक प्रसंग भी है। उन दिनों मुम्बई में अभिनेता और कलाकार प्रदीप कुमार भी प्रसिद्ध हो रहे थे, जिस कारण अक्सर गलती से डाकिया कवि प्रदीप की चिठ्ठी अभिनेता प्रदीप के पते पर डाल देता था। डाकिया सही पते पर पत्र दे, इस वजह से उन्होंने प्रदीप के पहले ‘कवि’ शब्द जोड़ दिया और यहीं से कवि प्रदीप के नाम से वे प्रख्यात हुए। कवि प्रदीप अपनी रचनाएं गाकर ही सुनाते थे और उनकी मधुर आवाज़ का उपयोग अनेक संगीत निर्देशकों ने अलग-अलग समय पर किया।
स्वतंत्रता आन्दोलन में योगदान
कवि प्रदीप गाँधी विचारधारा के कवि थे। उन्होंने जीवन मूल्यों की कीमत पर धन-दौलत को कभी महत्व नहीं दिया। कठोर संघर्षों के बावजूद उनके निवास स्थान ‘पंचामृत’ पर स्वर्ण के कंगुरे भले ही न मिलें, परन्तु वैश्विक ख्याति का कलश ज़रूर दिखेगा।
वह भारतीय स्वतंत्रता के आंदोलनों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे। एक बार स्वतंत्रता के आन्दोलन में उनका पैर फ्रैक्चर हो गया था और कई दिनों तक अस्पताल में रहना पड़ा। वे अंग्रेज़ों के अनाचार-अत्याचार आदि से बहुत दु:खी होते थे। उनका मानना था कि यदि आपस में हम लोगों में ईर्ष्या-द्वेष न होता तो हम ग़ुलाम न होते।
परम देशभक्त चंद्रशेखर आज़ाद की शहादत पर कवि प्रदीप का मन करुणा से भर गया था और उन्होंने अपने अंर्तमन से एक गीत रच डाला था, जिसके बोल इस प्रकार थे
वह इस घर का एक दिया था,
विधी ने अनल स्फुलिंगों से उसके जीवन का वसन सिया था
जिसने अनल लेखनी से अपनी गीता का लिखा प्रक्कथन
जिसने जीवन भर ज्वालाओं के पथ पर ही किया पर्यटन
जिसे साध थी दलितों की झोपड़ियों को आबाद करुं मैं
आज वही परिचय-विहीन सा पूर्ण कर गया अन्नत के शरण।
स्वतंत्रता के लिए उत्साह वर्धक गीत
वर्ष 1940 में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम अपने चरम पर था। देश को स्वतंत्र कराने के लिय छिड़ी मुहिम में कवि प्रदीप भी शामिल हो गए और इसके लिये उन्होंने अपनी कविताओं का सहारा लिया तथा अपनी कविताओं के माध्यम से देशवासियों में जागृति पैदा करने का कार्य किया।
ज्ञान मुखर्जी के निर्देशन में उन्होंने फ़िल्म ‘बंधन’ (1940) के लिए गीत लिखा। यूं तो फ़िल्म ‘बंधन’ में उनके रचित सभी गीत लोकप्रिय हुए, लेकिन ‘चल चल रे नौजवान…’ के बोल वाले गीत ने आजादी के दीवानों में एक नया जोश भरने का काम किया। उस समय स्वतंत्रता आन्दोलन अपनी चरम सीमा पर था और हर प्रभात फेरी में इस देश भक्ति के गीत को गाया जाता था। इस गीत ने भारतीय जनमानस पर जादू-सा प्रभाव डाला था। यह राष्ट्रीय गीत बन गया था।
उस समय सिंध और पंजाब की विधान सभा ने इस गीत को राष्ट्रीय गीत की मान्यता दी और ये गीत विधान सभा में गाया जाने लगा। प्रसिद्ध अभिनेता बलराज साहनी ने इस गीत को लंदन बी.बी.सी. से प्रसारित कर दिया। अहमदाबाद में महात्मा गांधी के सहयोगी और निजी सचिव महादेव भाई (महादेव देसाई) ने इसकी तुलना उपनिषद के मंत्र ‘चरैवेति-चरैवेति’ से की।
‘बंधन’ फ़िल्म का यह गीत ‘नासिक विद्रोह’ (1946) के समय सैनिकों का अभियान गीत बन गया था।
इस फ़िल्म में एक अन्य हल्का-फुल्का गीत भी था, ‘चना जोर गरम, मैं लाया मजेदार, चना जोर गरम।’ यह गीत फेरी वालों के मुख से गली-गली गूंजने लगा था।
अपने गीतों को कवि प्रदीप ने ग़ुलामी के विरोध में आवाज़ बुलंद करने के हथियार के रूप मे इस्तेमाल किया और उनके गीतों ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध भारतीयों के संघर्ष को एक नयी दिशा दी।
आज हिमालय की चोटी से गीत की लोकप्रियता
वर्ष 1943 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘किस्मत’ में प्रदीप के लिखे गीत ‘आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है, दूर हटो ए दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है’ जैसे गीतों ने जहां एक ओर स्वतंत्रता सेनानियों को झकझोरा, वहीं अंग्रेज़ों की तिरछी नजर के भी वह शिकार हुए। यह गीत ‘दूर हटो ए दुनिया वालों’ अंग्रेज़ी सरकार का सीधा विरोध था।
कवि प्रदीप के क्रांतिकारी विचार को देखकर अंग्रेज़ी सरकार द्वारा उनके लिए गिरफ्तारी का वारंट भी निकाला गया। गिरफ्तारी से बचने के लिये कवि प्रदीप को कुछ दिनों के लिए भूमिगत रहना पड़ा। यह गीत इस कदर लोकप्रिय हुआ कि सिनेमा हॉल में दर्शक इसे बार-बार सुनने की ख्वाहिश करते थे और फ़िल्म की समाप्ति पर दर्शकों की मांग पर इस गीत को सिनेमा हॉल में दुबारा सुनाया जाने लगा। इसके साथ ही फ़िल्म ‘किस्मत’ ने बॉक्स आफिस के सारे रिकार्ड तोड़ दिए। इस फ़िल्म ने कोलकाता के एक सिनेमा हॉल में लगातार लगभग चार वर्ष तक चलने का रिकार्ड बनाया था।
मशाल में प्रकृति की महानता उजागर
वर्ष 1950 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘मशाल’ में उनके रचित गीत ‘ऊपर गगन विशाल नीचे गहरा पाताल, बीच में है धरती ‘वाह मेरे मालिक तुने किया कमाल’ भी लोगों के बीच काफ़ी लोकप्रिय हुआ। इस फ़िल्म ‘मशाल’ के लिए उन्होंने सात गीत लिखे और संगीतकार सचिन देव बर्मन ने अच्छी धुनें भी बनाईं। प्रकृति की महानता को उजागर करने वाले इस फ़िल्म के एक गीत ‘ऊपर गगन विशाल, नीचे गहरा पाताल।‘ ने पूरे भारत में ख्याति अर्जित की। बंगाली गायक मन्ना डे ने लिखा था, “मैं तो प्रदीप जी का ऋणी हूँ और जन्म भर रहूँगा, क्योंकि मुझे सर्वप्रथम लोकप्रियता प्रदीप जी के गीत ‘ऊपर गगन विशाल’ ने ही दी है।” प्रसिद्ध गीतकार शैलेंद्र ने उनसे कहा, “प्रदीप जी, ऐसा और इस कोटि का गीत केवल आप ही लिख सकते हैं।” अभिनेता, निर्माता-निर्देशक राजकपूर ने बधाई देते हुए प्रदीप को अपनी बांहों में उठा लिया था।
फ़िल्म ‘नास्तिक’ (1954) में उनके रचित गीत ‘देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान कितना बदल गया इंसान’ समाज में बढ़ रही कुरीतियों और राजनैतिक भ्रष्टाचार के ऊपर सीधा प्रहार था।
वर्ष 1954 में ही बनी फ़िल्म ‘जागृति’ कवि प्रदीप के लिखे गानों के लिए आज भी स्मरणीय है। इस फिल्म के गीत ‘हम लाए हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के’ और ‘दे दी हमें आज़ादी बिना खडग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल’ आज भी लोगों के बीच लोकप्रिय हैं।
1960 के दशक में पाश्चात्य गीत-संगीत की चमक से भारतीय फिल्म निर्माता-निर्देशक अपने आप को नहीं बचा सके और धीरे-धीरे निर्देशकों ने कवि प्रदीप की ओर से अपना मुख मोड़ लिया, लेकिन वर्ष 1958 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘तलाक’ और वर्ष 1959 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘पैगाम’ में उनके रचित गीत ‘इंसान का इंसान से हो भाईचारा’ की कामयाबी के बाद प्रदीप एक बार फिर से अपनी खोई हुई लोकप्रियता पाने में सफल हो गए।
आपात काल के अत्याचारों में ‘जय संतोषी माँ’ का सहारा
अपने गीतों के बलबूते पर बॉक्स ऑफिस पर रिकार्ड तोड़ व्यवसाय करने वाली फ़िल्म थी ‘जय संतोषी मां’, जो कवि प्रदीप के जीवन में एक अविस्मरणीय यशस्वी फ़िल्म का उदाहरण बनी थी। 25 जून, 1975 को देश में आपात काल की घोषणा हुई थी। नागरिकों के संवैधानिक अधिकार तो स्थगित कर ही दिये गए, उनके व्यक्तिगत अधिकारों पर डाका पड़ने लगा। विरोध का स्वर उठते ही ‘मीसा’ नामक क़ानून के तहत आवाज़ उठाने वाले को जेल के अंदर कर दिया जाता था, जिसकी कोई जमानत नहीं थी। जनता में भय की भावना भरने के लिए देश के नामी-गिरामी नेताओं को जेल के भीतर कर दिया गया। ऐसी दबी-कुचली मानसिकता का त्राण ईश-आराधना में ही लोग मानने लगे। ऐसे वातावरण में अत्यंत कम बजट की फ़िल्म ‘जय संतोषी माँ’ आई। इसमें कोई नामचीन कलाकार नहीं था, परंतु कवि प्रदीप के छहों भक्ति प्रधान गीतों ने फ़िल्म को सुपरहिट कर दिया। कुछ गीतों की बानगी इस प्रकर है- ‘मैं तो आरती ऊतारूँ रे संतोषी माता की’, ‘यहाँ वहाँ जहाँ तहाँ मत पूछो कहाँ-कहाँ, है संतोषी माँ’, ‘करती हूँ तुम्हारा व्रत में स्वीकार करो माँ’।
पाकिस्तान में गीतों की नकल
आज़ादी के बाद 1954 में उन्होंने फ़िल्म ‘जागृति’ में स्वतंत्रता संग्राम के नायकों और महात्मा गांधी के जीवन दर्शन को बख़ूबी फ़िल्म के गानों में उतारा। और जब पाकिस्तान में फ़िल्म ‘जागृति’ की रीमेक ‘बेदारी’ बनाई गई तो जो बस देश की जगह मुल्क कर दिया गया और पाकिस्तानी गीत बन गया….हम लाए हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के, इस मुल्क़ को रखना मेरे बच्चों संभाल के..। कुछ इसी तरह ‘दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल’ की जगह पाकिस्तानी गाना बन गया….. यूँ दी हमें आज़ादी कि दुनिया हुई हैरान, ऐ क़ायदे आज़म तेरा एहसान है एहसान। ऐसे ही था ‘बेदारी’ का ये पाकिस्तानी गाना….आओ बच्चे सैर कराएँ तुमको पाकिस्तान की, जिसकी खातिर हमने दी क़ुर्बानी लाखों जान की। ये गाना असल में था आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ झांकी हिंदुस्तान की…।
राष्ट्रकवि प्रदीप का व्यक्तित्व
कवि प्रदीप ने बहुत ज़्यादा साहित्य का अध्ययन नहीं किया था, वो जन्मजात कवि थे और यही उनका असली परिचय है। प्रदीप जी ने किसी राजनीतिक विचारधारा को स्वीकार नहीं किया। सादगी भरा जीवन जीते थे, जो सोचते थे वही लिखते थे, सरल थे, यही उनकी ख़ासियत थी। उन्होंने सिनेमा को ज़रिया बनाकर आम लोगों के लिए लिखा
बताया जता है कि, एक बार शायर-गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ने प्रसिद्ध संगीत निर्देशक और अपने समधी, नौशाद के साथ मिलकर कवि प्रदीप की लेखनी का मजाक उड़ाया था कि “आंख क्या बाल्टी है जो उसमें पानी भरने की बात लिख दी है प्रदीप ने।” कवि प्रदीप उस पर भी केवल मुस्कुरा दिए और कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की।
अभिनेता अशोक कुमार उनके बारे में बताते थे कि कवि प्रदीप आमतौर पर दीवार की ओर मुँह करके उस पर हाथों से ताल देते हुए गीत सुनाया करते थे। अगर उन्हें सबके सामने मुँह करके गीत सुनाने के लिए कहा जाता था, तो वे माचिस की डिब्बी या मेज पर ताल देते हुए गाना सुनाया करते थे। ‘ऊपर गगन विशाल’ गीत सुनाने के समय कवि प्रदीप अपने हाथ को ऊपर-नीचे हिला-हिलाकर तन्मयता दिखाते थे। एक संत पुरुष, सीधे-सादे, किसी भी प्रकार के दिखावे से दूर रहने वाले कवि प्रदीप के लिए मैं केवल इतना ही कह सकता हूँ कि हिन्दी फ़िल्म जगत् में भावनापूर्ण साहित्यिक तथा उच्च स्तरीय गीत लिखकर कलम के धनी कवि प्रदीप ने कमाल ही किया।
सम्मान और पुरस्कार
कवि प्रदीप को अनेक पुरुस्कारों से सम्मानित किया गया, जिनमें ‘संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार’ (1961) तथा ‘फ़िल्म जर्नलिस्ट अवार्ड’ (1963) भी शामिल हैं। उनके जीवन में ही फ़िल्मों में उनके योगदान के लिए सरकारें, फ़िल्मोद्योग तथा अन्य संस्थाएँ उन्हें सम्मानों और पुरस्कारों से अंलकृत करते रहे। उन्हें सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मी गीतकार का पुरस्कार राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद द्वारा दिया गया था। 1995 में राष्ट्रपति द्वारा ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि दी गई।
फ़िल्म जगत् में उल्लेखनीय योगदान के लिए 1998 में भारत के राष्ट्रपति के.आर. नारायणन द्वारा प्रतिष्ठित ‘दादा साहब फाल्के पुरस्कार’ दिया गया। पुरुस्कार समारोह के दौरान उनकी पुत्री सुश्री मितुल जब कवि प्रदीप जी को पहिया कुर्सी पर बिठाकर मंच की ओर बढ़ रही थीं तो हॉल में ‘दूर हटो ऐ दुनिया वालों’ गीत बज रहा था। सभी उपस्थित जन अपनी जगहों पर खड़े हो गए थे। उनकी आँखों में आँसू थे। राष्ट्रपति ने पहले प्रदीप के स्वास्थ्य के बारे में पूछा और फिर पुरस्कार प्रदान किया। जब वे लौटने लगे तो दूसरा गीत बज उठा ‘हम लाए हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के’ लोग अब भी खड़े थे और तालियाँ बजाये जा रहे थे।
कवि प्रदीप ने अपने जीवन में 1700 गाने लिखे। उनका हर फ़िल्मी या ग़ैर फ़िल्मी गीत अर्थपूर्ण होता था और जीवन को कोई न कोई दर्शन समझा जाता था।
फिल्म ‘बंधन’ के अपने गीत ‘रुक न सको तो जाओ तुम’ को यथार्थ करते हुए 11 सितम्बर, 1998 को राष्ट्रकवि प्रदीप का कैंसर से लड़ते हुए 83 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके मर्मस्पर्शी गीतों के कारण लोग उन्हें दीवानगी की हद तक प्यार करते थे। संगीत निर्देशक सचिन देव बर्मन ने उनके गीत, उनका गायन और स्वर संयोजन देखकर कहा था कि, “तुम्हें कोई ‘आउट’ नहीं कर सकता।“ प्रदीप मर कर भी आउट नहीं हुए हैं। वे अब अपने गीत की पंक्तियों में अमर हो गए हैं।



